Bhopal – भारत में संविधान लागू होने के पश्चात् उसमें 106 संशोधन हो चुके हैं परन्तु यह सभी संविधान की किताब में दूसरे कानूनों एवं ढांचागत प्रावधानों के साथ समाहित होकर एक साथ जिल्ड में नहीं बंधे हैं अपितु उसमें नये-नये संसोधनों के कागज घुसा दिये गये हैं | कई नियम-कायदे व प्रोटोकॉल जोडे गये, हटाये गये जिन्हें साधारण भाषा में संविधान की किताब में काटाफास, ओवरराइटिंग या नई-नई लाईनों को बिच में लिख देने से समझ सकते हैं | केन्द्रीय जांच ब्यूरों (सीबीआई) के निर्देशक के चयन का दंगल इन्हीं कारणों का नतीजा है |
राष्ट्रीय न्यायिक आयोग भोपाल में उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ या श्री जगदीप धनखड़ (नौकरी – उपराष्ट्रपति पद) ने सीबीआई निर्देशक के चयन की प्रक्रिया के दंगल में मुख्य न्यायाधीश के संवैधानिक पद को यह कहते हुए घसीट लिया कि सीबीआई निर्देशक के चयन में भारत के मुख्य न्यायाधीश क्यों हैं? यह बयान व्यक्तिगत हैं या पद पर रहते हुए दे रहे हैं, इसके वैचारिक भ्रमजाल में उलझे होते हुए नियम बनाते समय सिस्टम / व्यवस्था ने घुटने टेकने का बोलकर न जाने कितनी मर्यादाओं को तोड दिया और संविधान की धज्जियां उडाने के साथ-साथ अपने से पूर्वतर और सीनियर लोगो पर भद्दा व घृणित आरोप लगाते हुए नैतिकता को तार-तार कर दिया | मंच, उसके आयोजक, निमंत्रण पद, समय व किस खाते से खर्च वहन हुआ उसे देखकर आप स्वयं तय कर ले कि बयान व्यक्तिगत हैं या नहीं | उनके व्यक्तिगत राय कह देने से क्या होगा क्योंकि अधिकांश मीडिया ने इसे उपराष्ट्रपति का बयान कहकर छापा व दिखाया है |
देश में संविधान लागू होने के पश्चात् केन्द्र सरकार के कर्मचारियों द्वारा रिश्र्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए एक केन्द्रीय सरकारी एजेंसी की आवश्यकता महसूस करी गई | इसके लिए 1946 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम लागू किया गया और उसका अधीक्षण गृहमंत्रालय को सौंपा गया | कार्यपालिका के एक मंत्रालय के अधीन रहते हुए उसके कार्यों को भारत-सरकार के सभी विभागों तक विस्तारित कर दिया | इसके बाद 1963 में केन्द्रिय गृहमंत्रालय के प्रस्ताव पर केन्द्रिय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की स्थापना करी गई | इसमें दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) को सीबीआई में विलय कर दिया और सीबीआई को एक प्रभाग बना दिया | आगे जाकर इसे गृहमंत्रालय के अधिकार श्रेत्र से कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय को हस्तांतरित कर दिया गया | विज्ञान के सिद्धान्त के आधार पर यह कार्यपालिका के एक हिस्से यानि एक मंत्रालय के अन्तर्गत प्रभाग हुआ | अधिकारों के हिसाब से यह सिर्फ केन्द्रिय कर्मचारियों पर ही प्रभावी हो सकता हैं |
सीबीआई की स्थापना गृहमंत्रालय के प्रस्ताव फर हुई इसलिए यह न तो संवैधानिक निकाय हुआ और न ही वैधानिक निकाय हैं | इसकी शक्तियों का आधार दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 हैं और दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के अधीन आती हैं और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नही हैं | यह तकनीकी रूप से कार्यपालिका के अधीन एक मंत्रालय का हिस्सा रहा तो इस पर भारत-सरकार का टैग किस आधार पर लगा वो व्यवस्था की एक श्रृंखला में फीट नहीं बैठता | इसे अन्त-राज्यीय मामले जांच के लिए सौंपे गये | तकनीकी रूप से काम भारत-सरकार के होने लगे |
समय के साथ-साथ व्यवस्था व ढांचागत कोई परिवर्तन नहीं करा परन्तु अधिकार संयुक्त सचिव और उसके ऊपर के रैंक के अधिकारीयों के खिलाफ जांच का दिया जो विधायकों, सांसदों, मुख्यमंत्रीयों, केन्द्रिय मंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की चौखट तक भी पहुंच गया | कार्यपालिका यानि तथाकथित सरकार में जो रहा वो चुप रहा क्योंकि उसके अधीन कर्मचारी उनकी जांच कर अपराधी के तौर पर सजा नहीं दिला सकते थे | यह राज धीरे-धीरे खुलने लगा और उच्चतम न्यायालय के सामने आ गया | सीबीआई पर बंद पिंजरे में तोता की टिप्पणी इसी का सत्यापन था |
सुप्रिम कोर्ट में सीबीआई पर कही फैसले आये | इसमें 2014 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 की धारा 6ए को रद्द करने का भी था | इससे वरिष्ठ सिविल सैनिकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए केन्द्र सरकार न की कार्यपालिका से पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता खत्म हो गई | सुप्रिम कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान असंवैधानिक था और संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करता था | सीबीआई को व्यवस्था में किस श्रृंखला से जोड रखा गया हैं उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया उल्टा इसे भारत-सरकार की केन्द्रिय जांच एजेंसी के रूप में मानकर उसका दायरा व अधिकार बढाते गये | यह सब कार्यपालिका को भारत-सरकार मानने का अल्पज्ञान व बनाया हुआ ख्याली हव्वा का परिणाम था | संविधान में भारत-सरकार किसे कहां गया उस पर किसी ने घोर नहीं करा और कार्यपालिका यानि तथाकथित सरकार में पूरे संविधान को साईडलाईन कर दिया |
सुप्रिम कोर्ट ने सीबीआई के अधिकार क्षेत्र व भारत-सरकार के टैग को देखते हुए निष्पक्ष जांच व न्याय को बनाये रखते के लिए इसके निर्देशक के चुनाव में भारत-सरकार के रूप में एक समीति गठित करने का प्रावधान कर दिया जिसमें कार्यपालिका के लोकतान्त्रिक स्तम्भ से प्रधानमंत्री, विधायिका से विपक्ष के नेता या विपक्ष की सबसे बडी पार्टी के नेता, न्यायपालिका से मुख्य न्यायाधीश शामिल करे गये | चौथे स्तम्भ मीडिया को कोई संवैधानिक चेहरा ही नहीं दे रखा इसलिए उसे छोड दिया | अब उपराष्ट्रपति की माने और सीबीआई के ढांचे के अनुसार चयन समीती से मुख्य न्यायाधीश को बाहर करे तो सीबीआई में दर्ज हजारों मामले अपने आप ही कार्यक्षेत्र या अधिकार क्षेत्र से परे होने के कारण खत्म हो जायेंगे |
संसद को संविधान संसोधन का अधिकार हैं परन्तु उसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए इसलिए संसद को तकनीकी रूप से सर्वोपरी नहीं कह सकते हैं लेकिन इसके कार्यक्षेत्र के आधार पर क्षेत्र विशेष में सर्वोपरी कह सकते हैं | अब सबसे बडा प्रश्न संविधान संसोधनों व कानूनों, नियम-कायदों व प्रोटोकॉल को अन्य संवैधानिक प्रावधानों से समन्वय कौन करेगा? उपराष्ट्रपति ने तो संविधान पीठ के गठन व संसोधन पर रोक लगाने व सुप्रिम कोर्ट को सिर्फ़ संविधान के अनुसार क्या गलत हैं और सही हैं वो देखने की बात कही हैं |
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक








































