Home महत्वाची बातमी इतिहास डॉ भीमराव अंबेडकर के बिना अधूरा है – लियाकत शाह

इतिहास डॉ भीमराव अंबेडकर के बिना अधूरा है – लियाकत शाह

36
0

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के अम्बवाड़े गांव में १४ अप्रैल १८९१ में महार जाति में हुआ था। डॉ अंबेडकर के पिता श्री रामजी राव सतपाल सेना में सूबेदार के पद पर थे। वे अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। अपने बच्चों के साथ बैठकर पूजापाठ करना उनका नित्य कर्म था। डॉक्टर अंबेडकर की माता का नाम भीमाबाई था। उनका स्वभाव अत्यंत सरल और गंभीर था। वे बनावटी जीवन से कोसों दूर थी। डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में तमाम यातनाएं झेली, लेकिन इसके बाबजूद भी वे इससे कभी घबराए नहीं और अपने कर्तव्य के प्रति सच्ची निष्ठा के साथ आगे बढ़ते रहे और समाज से छूआछूत और जातिवाद जैसी बुराईयों को जड़ से खत्म करने में सफल हुए। डॉ भीमराव अंबेडकर को देश को एकता के सूत्र में बांधने वाले संविधान के निर्माता के रुप में भी जाना जाता है। दलितों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर मध्यप्रदेश के इंदौर के एक दलित परिवार में जन्में थे। दलित होने की वजह से डॉ भीमराव अंबेडकर को ऊंची जाति के लोग छूना तक पसंद नहीं करते थे, यही नहीं स्कूल में भी शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें तमाम तरह की कठिनाइयां झेलनी पड़ी थी। विद्दान और योग्य होने के बाबजूद भी उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। भेदभाव का शिकार हुए डॉ भीमराव अंबेडकर को अपने आर्मी स्कूल में पानी तक छूने की इजाजत नहीं थी, उनके कास्ट के बच्चों को चपरासी उपर से डालकर पानी देता था, वहीं अगर जिस दिन चपरासी छुट्टी पर होता था, उस दिन उन्हें और उनके कास्ट के सभी साथियों को पूरा दिन प्यासा ही रहना पड़ता था। फिलहाल डॉ भीमराव अंबेडकर ने तमाम मुश्किलों और संघर्षों के बाद भी अच्छी शिक्षा हासिल की और बाद में समाज में फैली छूआछूत और जातिवाद को जड़ से खत्म कर दिया। डॉ भीमराव अंबेडकर एक होनहार और प्रखर बुद्धि के छात्र थे, वे बहुत तेजी से किसी विषय को जल्दी से समझ लेते थे, यही वजह है कि वे अपनी सभी परीक्षाओं में अच्छे अंक से सफल होते चले गए और १९०७ में उन्होंने मैट्रिक की डिग्री हासिल कर ली और इसके बाद साल १९१२ में उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। यही नहीं फेलोशिप लेकर उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। अमेरिका से लौटने के बाद उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें अपने बड़ोदा के राजा ने अपने राज्य का रक्षामंत्री बना दिया, लेकिन इस पद पर रहते हुए भी उन्हें दलित होने की वजह से काफी अपमान झेलना पड़ा था। वहीं कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होनें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में काम किया। ८ जून, १९२७ को उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय द्धारा डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया था। इस तरह वे उच्च शिक्षा हासिल करने वाले पहले दलित छात्र बन गए। डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में तमाम कठिनाइयां और परेशानियां झेलने के बाद भी कभी हार नहीं मानी और अपनी सच्ची ईमानदारी और कठोर निष्ठा के साथ वह अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आगे बढ़ते रहे। इसके साथ ही छूआछूत और जातिवाद को समाज से जड़ से खत्म करने के लिए सफलता अर्जित की। और आधुनिक भारत के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र दल के सदस्य के रूप में वह अमेरिका चले गए। वहां से उन्होंने एम.ए तथा पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की। वे लंदन में रह कर डीएससी की उपाधि प्राप्त करना चाहते थे लेकिन छात्रवृत्ति का समय समाप्त होने के कारण से भारत लौटे आये। वर्ष १९२८ में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मुंबई के सिडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के अध्यापक के रूप में कार्य आरंभ कर दिया। भारत का संविधान एक हस्तलिखित है। इसमें ४८ आर्टिकल हैं। इस संविधान को तैयार करने में २ साल ११ महीने और १७ दिन का वक्त लगा था। भारत में २६ नवम्बर को हर साल संविधान दिवस मनाया जाता है, क्योंकि वर्ष १९४९ में २६ नवम्बर को संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान को स्वीकृत किया गया था जो २६ जनवरी १९५० को प्रभाव में आया। डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत के संविधान का जनक कहा जाता है। भारत की आजादी के बाद काग्रेस सरकार ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत के प्रथम कानून मंत्री के रुप में सेवा करने का निमंत्रण दिया। जब भारत के संविधान को अपनाया गया था तब भारत के नागरिकों ने शांति, शिष्टता और प्रगति के साथ एक नए संवैधानिक, वैज्ञानिक, स्वराज्य और आधुनिक भारत में प्रवेश किया था। भारत का संविधान पूरी दुनिया में बहुत अनोखा है। हम संविधान दिवस को क्यों मनाते है भारत में संविधान दिवस २६ नवंबर को हर साल सरकारी तौर पर मनाया जाने वाला कार्यक्रम है जो संविधान के जनक डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर को याद और सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। भारत के लोग अपना संविधान शुरू करने के बाद अपना इतिहास, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता और शांति का जश्न मनाते है। संविधान दिवस भारत के संविधान के महत्व को समझाने के लिए हर साल २६ नवंबर के दिन मनाया जाता है। जिसमें लोगो को यह समझाया जाता है कि आखिर कैसे हमारा संविधान हमारे देश की तरक्की के लिए महत्वपूर्ण है तथा डॉ अंबेडकर को हमारे देश के संविधान निर्माण में बहोत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। आजादी के पहले तक भारत में रियासतों के अपने अलग-अलग नियम कानून थे, जिन्हें देश के राजनितिक नियम, कानून और प्रक्रिया के अंतर्गत लाने की आवश्यकता थी। इसके अलावा हमारे देश को एक ऐसे संविधान की आवश्कता थी। जिसमें देश में रहने वाले लोगों के मूल अधिकार, कर्तव्यों को निर्धारित किया गया हो ताकि हमारा देश तेजी से तरक्की कर सके और नयी उचाइयों को प्राप्त कर सके। क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर केवल समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा धर्म शास्त्र के ही नहीं वरन विधिशास्त्र के भी प्रकांड विद्वान थे। उनके विधिशास्त्र के ज्ञान के कारण ही उन्हें १९४७ में भारतीय संविधान की ६ सदस्य संविधान समिति का अध्यक्ष चुना गया। इन सदस्यों में से अधिकांश या तो बैठकों में अनुपस्थित रहे या कुछ विदेश चले गए। परिणाम स्वरुप डॉ भीमराव अंबेडकर ने अकेले ही इस कार्य को पूरा किया इसलिए उन्होंने भारतीय संविधान का जनक कहा जाता है। जीवनभर समाज में व्याप्त असमानता, अस्पृश्यता और सवर्णों के दुर्व्यवहार को सहन करते रहने वाले डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने ६ दिसंबर १९५६ को इस संसार से विदा ले ली। भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत किया। डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था के “शिक्षित बने, संघटित रहे और संघर्ष करे” आज समाज के लोगो इसी चीज कि जरुरत है।

लियाकत शाह एमए बी.एड
महाराष्ट्र राज्य कार्यकारी समिति सदस्य,
अखिल भारत जर्नालीस्ट फेडरेशन

Unlimited Reseller Hosting