
भोपाल – अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के बालस्वरूप मन्दिर के अन्दर पत्थर की मूर्ति में “प्राण-प्रतिष्ठा” करने का कार्यक्रम विज्ञान की तकनीकों के सहारे चलायमान कराया जा रहा हैं | इस कार्यक्रम के सारे फैसले राम मन्दिर ट्रस्ट के माध्यम से लिये जा रहे हैं | इसके फैसले जिस तरीके से आते हैं फिर बदलते हैं और बाद में उसकी रुपरेखा देखकर लोगों के मन में भगवान राम के प्रति जो आस्था बसी हैं उस आधार पर पीढीयों से चली आ रही मर्यादाओं के अनुरूप नैतिकता से सच्चाई के साथ कसौटी पर रखते हैं तो वे गरिमा के पथ से भटकते हुए नजर आ रहे हैं |
जनमानस के दिल व दिमाग में यह अवधारणा एक के बाद एक निर्णयों की चोट से सोने की तरह निखर कर चमक के साथ बलवती होती जा रही हैं | आज हम एक सबसे बडे़ फैसले को विज्ञान की सैद्धान्तिक तर्कशिलता की सच्चाई वाली कसौटी पर तौल कर सामने रखते हैं | इसमें बालस्वरूप भगवान राम को पहले ही ऐसी शिक्षा, आदर्श के मार्ग पर भटकाने की कोशिश दिखती हैं कि वो जीवन में आगे कभी मर्यादा पुरुषोत्तम बन ही न पाये | महाज्ञानी, विद्वान, आज के ऋषि-मुनियों, साधु-संतों व वेदों -उपनिषदों का ज्ञान समेटे कथावाचकों व पंडितों एवं पंडिताईनों ने इस प्राण-प्रतिष्ठा का मोहर्त समय कुल एक मिनिट चौबीस सैकंड का बताया हैं | इस समय की गणना इन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मानक समय से तय की हैं, महाकाल वाले उज्जैन के विक्रम सम्बत वाले पंचाग से या अयोध्या पर रामलला की मूर्ति रखी जमीन के अक्षांतर व देक्षांतर के आधार पर यह हमें नहीं पता | अब शिवशक्ति केन्द्र के चन्द्रमा पर चले जाने से कोई यह भी नहीं बता पा रहा हैं कि मोहर्त के समय से हटकर एक दो क्षण आगे-पीछे प्राण-प्रतिष्ठा हुई तो शास्त्रों के अनुसार कौनसी अनहोनी या विपदा आ सकती हैं |
इतना तय कर दिया की इस अल्प समय में एक व्यक्ति न कि महान ऋषि-मुनि, न साधु-संत गर्भगृह में उपस्थित रहकर पत्थर की मूर्ति या प्रतिमा से पर्दा हटाएंगे, उनकी आंखों में काजल लगायेंगे और फिर आईने में चेहरा दिखाकर प्राण-प्रतिष्ठा की रस्म या विधान पूरा करेंगे | इस व्यक्ति विशेष का चयन उसके आचरण, संस्कार व जीवन की मर्यादाओं को देख-परख कर लिया हैं या वर्तमान सत्ता के शीर्ष पद के रूप में जिसे धर्मों के अनुसार पहले भगवान का तुल्य रूप माना जाता था | यह वर्तमान लोकतांत्रिक सत्ता का शीर्ष भी नहीं हैं क्योंकि राष्ट्रपति को तो निमंत्रण ही नहीं दिया गया जबकि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद कानूनन सबसे पहले राष्ट्रपति-भवन जाकर पहली पर्ची काट चंदा/दान लिया था | सामाजिक, धार्मिक, व्यक्तितव के आधार पर देखे और व जीविकोपार्जन के लिए किस पद पर नौकरी या व्यवसाय करता हैं उसे छोड़ दे तो सामाजिक निष्ठा व मर्यादा भी उसके साथ नजर नहीं आती |
इसी व्यक्ति द्वारा अपनी अपनी धर्मपत्नी को आज के कानूनी तरीके व धार्मिक मर्यादा के बिना छोड़ देने का कलंक माथे पर लगा हुआ हैं | यदि ऐसे चाल-चरित्र वाला मानस भगवान राम के बाल्यावस्था में उनके पास रहता और अपना उदाहरण देकर आईना दिखाता तो श्री राम कभी मर्यादा पुरुषोत्तम तो क्या भगवान भी नहीं बन पाते | श्री राम के दिल व दिमाग में अपनी धर्मपत्नी के लिए रावण से महासंग्राम व अधर्म को मिटाने व उस पर जीत के प्रण हेतु प्राणों को भी दांव पर लगाने का साहस भी क्षणिक मात्र नहीं लाते वो भी ऐसे ही छोड़ कर चल बनते आखिरकार वो भी राजा थे सारी दिव्य शक्तियों के साथ बडी सेना उनके पास थी इसलिए किसकी हिम्मत थी कि सवाल पूछ ले |
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को जीवित व बालक रूप में संविधान के अनुसार करीबन तीस वर्षों पूर्व ही मान्यता दे दी | संविधान में क्या लिखा हैं वो आप हमसे बेहतर समझते हैं | अब जीवित बालक रामलला राजनैतिक जरूरत के अनुसार नफा-नुकसान देखकर समय की धज्जियां उडाते हुए जब भी बड़ा होगा और संविधान के अनुसार अदालत की पुष्टि भी हो जाने पर यह युवा बालक कभी अपनी धर्मपत्नी के लिए महासंग्राम व धर्मयुद्ध नहीं करेगा क्योंकि उसको वैसी ही घुटि पिलाई जा रही हैं | विज्ञान तो यह कहता हैं कि जन्म लेने वाला हर बच्चा आदर्श होता हैं उसकी घुटि, शिक्षा, आस-पास के माहौल, रहन-सहन व चाल-चलन से वो हिन्दु, मुस्लिम, सीख, ईसाई, जैन, बौद्ध, फारसी इत्यादि-इत्यादि बनता हैं | बालीवुड की मूवी अमर-अकबर-ऐन्थौनी में अच्छे से अभिव्यक्त भी करा गया हैं | आज भी समाज में यह किन्वती प्रचलन में हैं कि कोई बच्चा व बडा गलती करता हैं, बदमाशी करता हैं तो बड़े-बुजुर्ग तंज कस देते हैं कि तुझे पैदा होने पर सबसे पहले घुटि किसने पिलाई थी |
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक












































