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दैवीय शक्तियों के अपमान का प्रतिफल हैं संसद की मर्यादाओं का कलंकित होना !

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भोपाल – हर धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृति, पौराणिक सभ्यताएं, जीवन एवं शासन किसी न किसी महान व्यक्तित्व व उसके माध्यम से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से दैवीय शक्तियों से जुड़ा रहा हैं | वर्तमान में भी लोकतान्त्रिक तरीके में सत्ता या शासन का केन्द्र संसद भी इससे जुड़ा हैं | नये संसद-भवन के निर्माण व शुभारम्भ में राजनेताओं ने इन सभी दैवीय शक्तियों के साथ राजनैतिक चालों से अपमान, अनादर, तिरस्कार व फूट डालने का जो घिनौना काम करा हैं उसका प्रतिफल अब संसद की मर्यादाओं के भंग होने व कलंकित होने के रूप में नजर आने लगा हैं |

सांसद की अनुशंसा से बनाये वैलिड कानूनी पास से दो युवकों का संसद के अन्दर प्रवेश कर जाना, बाहर मीडिया का खबरें दिखाने को लेकर आपसी छीना-छपटी करना व सुरक्षा चूक को छोड़ आतंकवादी हमले की चाद्दर से अपनी नाकामियों को छुपाने की नाकाम कोशिश करना, गाली-गलौच करना व इसके अतिरिक्त करिबन ड़ेढ सौ सांसदों को बर्खास्त करके एक तिहाई देश के लोगों के प्रतिनिधित्व को शून्य कर बिना सार्थक व पूर्ण वैचारिक मंथन के नये कानूनों की जड़ी से देशवासियों को अंधकारमय भविष्य में धकेल दिया व पक्ष का विपक्ष पर और विपक्ष का पक्ष पर संसद की मर्यादाओं के कलंकित, मटियामेट होने के आरोप लगाकर सामुहिक रूप से ऐसा होने की पुष्टि करते हुए अपने कार्यकाल के दौरान चेहरे पर कालिख पूत जाने पर फूहड़ता, निर्लजता , अनैतिक व असभ्य रूप से दूसरे के नंगेपन चरित्र को बता-बता कर अपने चरित्र के दिखते नंगेपन को छोटा बताना इन्हीं दैवीय शक्तियों के प्रकोप के रूप में झलका हैं |

प्राय: हर चुनाव से पहले व सामान्य रूप से देश के किसी भी श्रेत्र-विशेष में कोई भी राजनेता या संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति जाता है तो उस क्षेत्र के धार्मिक स्थलों जिसमें मन्दिर, मज्जिद, गुरूद्वारा, गिरजाघर, जैनालय, बौद्धिक मठ, आश्रम इत्यादि आते हैं वहां जाकर आशिर्वाद लेते हैं और चुनाव जितने से पहले सार्वजनिक प्रण लेते हैं कि उनके आदर्श, धार्मिक निष्ठा, सामाजिक मूल्यों के अनुरूप सांसद एवं सभी पदों पर रहकर जनता के लिए काम करेंगे | इसके लिए सभी दैवीय चिह्न एवं प्रसाद भी साथ ले जाते हैं | कहीं माननीय तो इन दैवीय चिह्नों, पोषाकों को शरीर पर धारण कर लेते हैं | इससे वोटर जब उन्हें देखे तो उसे विश्वास हो जाये की उसके आराध्य को मानने वाला हैं इस कारण उनकी निष्ठा तले अपना बहुमूल्य वोट देकर विजयी श्री दिलवा दे |

वर्तमान में इन सांसदों ने जीत के बाद सभी दैवीय शक्तियों को राजनैतिक छल-कपट से ठगते हुए नये संसद-भवन में गौण कर दिया व उन्हें नंदी के प्रतिक रूप में बैठे सैंगोल के समान उचित आदर व सुशोभित करने वाला स्थान नहीं दिया | इन्होंने यह दर्शाया कि अन्य सभी दैवीय शक्तियों के आशिर्वाद में कोई दम नहीं हैं, यह तो सिर्फ आडम्बर हैं इसलिए लोकतन्त्र व देश की जनता की सरकार के हिस्से संसद व सभी सांसदों को उनकी छत्रछाया नहीं चाहिए | दैवीयों, त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) सहित हर देवता जिन्हें चौरियासी करोड़ या कोटि/प्रकार के बताये जाते हैं वो भगवान शिव के सेवक नंदी के अधीन व छोटे हैं क्योंकि सैंगोल के शीर्ष पर वो ही विराजमान हैं | इन सभी दैवीय शक्तियों के प्रतिक निचे सांसदों के पास रहेंगे और ऊपर सिहांसन से नदी उन्हें दिशा निर्देश देकर देश की जनता के साथ धार्मिक रूप से न्याय करेंगे |

यह सच आप संसद चलाने वाले और सांसदों के लिए आसन के माध्यम से दिशा-निर्देश देने वाले सचिवालयों के कर्मचारीयों को बतायेंगे तो वो सभी दैवीय शक्तियों के प्रतिकों को संसद के दरवाजे पर ही रखवाकर नंदी विराजित राजदंड सैंगोल के नीचे आने से बचाने की कानूनी व्यवस्था कर देंगे ताकि वे अपने पद के आधार क्षेत्र की अवेहलना करने से बचे रह सके |

सत्य की निष्ठा व विज्ञान के दृष्टिकोण से देखे तो हर धार्मिक स्थल के सेवकों को शोभा यात्रा, रथ-यात्रा, जुलूस निकालकर अपने-अपने दैवीय शक्तियों की महिमा बताते हुए उनके प्रतिकों जैसे त्रिशुल, सुदर्शन चक्र, गदा, तीर-धनुष, माता की चुनरी, चन्द्रमा, क्रोस इत्यादि-इत्यादि को अपने सांसदों को देने चाहिए ताकि आने वाले फरवरी के नये सत्र में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा शुरूआत के साथ सभी को उचित स्थान मिल जाये | महामहिम ब्रह्माकुमारी से जुडी रही हैं इसलिए उन्हें पता है कि भगवान शिव नंदी के आराध्य हैं उनके सेवक नहीं और सभी धर्मों के प्रतिक का महत्तव संविधान के अनुसार कितना हैं |

शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक